नया उपन्यास – २०२६
तीसरा पग –तीसरा पग
सत्ता , अहंकार और आत्मबोध की पुराकथा
यह कृति पौराणिक आख्यानों की साहित्यिक पुनर्व्याख्या है। इसमें पुराण-कथाओं को यथावत दोहराने के स्थान पर उनके भीतर उपस्थित मनुष्य, सत्ता, भय, स्मृति, अधिकार और उत्तरदायित्व के प्रश्नों को कथा के माध्यम से देखने का प्रयास किया गया है। पात्रों और घटनाओं का साहित्यिक रूपांकन रचनात्मक कल्पना के अधीन है।-लेखक( Phone-9334077378
अध्याय 1
हिरण्यगर्भ से कश्यप तक
आरम्भ
आरम्भ में क्या था?
यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही अनन्त है। जब न पृथ्वी थी, न आकाश; न दिन था, न रात; न दिशाएँ थीं, न ऋतुएँ-तब क्या था?
ऋषियों ने उस आदि-अवस्था को शब्द देने का प्रयास किया। किसी ने उसे अव्यक्त कहा, किसी ने परम पुरुष, किसी ने नारायण और किसी ने हिरण्यगर्भ, वह स्वर्णिम गर्भ, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि अभी रूप ग्रहण करने की प्रतीक्षा कर रही थी।
सृष्टि से पहले शून्य भी नहीं था, क्योंकि शून्य में भी किसी सम्भावना का आभास होता है। वहाँ केवल वह था जिसे न देखा जा सकता था, न छुआ, न किसी नाम में बाँधा जा सकता था। वही अव्यक्त चेतना धीरे-धीरे सृजन की आकांक्षा में बदलने लगी।
अनन्त जलराशि पर विष्णु योगनिद्रा में स्थित थे। उनके भीतर समय अभी निष्क्रिय था, दिशाएँ अनाम थीं और अस्तित्व अपनी ही निस्तब्धता में डूबा हुआ था। फिर उस निस्तब्धता में एक सूक्ष्म स्पन्दन हुआ।
चेतना ने स्वयं को जाना।
और सृष्टि ने अपने भीतर से सृजन की इच्छा की।
विष्णु की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ। वह कमल धीरे-धीरे अनन्त जल के ऊपर उठता गया और उसके हृदय में ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ।
ब्रह्मा ने आँखें खोलीं।
चारों ओर जल था। नीचे अथाह अन्धकार और ऊपर ऐसा आकाश, जिसकी कोई सीमा दिखाई नहीं देती थी। उन्होंने उस कमल की जड़ खोजने का प्रयास किया। बहुत दूर तक अन्धकार में उतरते गए, लेकिन मूल तक नहीं पहुँच सके। लौटकर उन्होंने ध्यान लगाया।
तभी उन्हें अपने भीतर एक ऐसी सत्ता का अनुभव हुआ, जो उनसे पहले भी थी और उनके बाद भी रहने वाली थी।
विष्णु।
तब ब्रह्मा ने जाना कि जन्म लेना सृष्टि करना नहीं है। सृजन के लिए ज्ञान चाहिए, दिशा चाहिए और सबसे बढ़कर वह विवेक चाहिए जो सम्भावना को रूप दे सके।
सृष्टि पहले चेतना में जन्म लेती है, फिर रूप में।
ब्रह्मा ने सृष्टि का विस्तार आरम्भ किया।
लेकिन केवल पदार्थों से सृष्टि पूर्ण नहीं होती। उसे जीवन चाहिए, गति चाहिए, जन्म और परिवर्तन चाहिए। इसलिए ब्रह्मा की मानस-सृष्टि से प्रजापतियों का प्राकट्य हुआ-मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, भृगु और दक्ष।
वे केवल वंश बढ़ाने वाले पुरुष नहीं थे। वे सृष्टि की विविध शक्तियों के संवाहक थे। मरीचि में प्रकाश की सूक्ष्मता थी, अत्रि में तप और ज्ञान की गहराई, अंगिरा में अग्नि और मंत्र की शक्ति, वसिष्ठ में ज्ञान और राजधर्म का विवेक, भृगु में तप और निरीक्षण की कठोर दृष्टि और दक्ष में सृष्टि-विस्तार की अदम्य आकांक्षा।
समय के साथ ये धाराएँ अलग-अलग वंशों में फैलती गईं। मरीचि के वंश में कश्यप का जन्म हुआ-वह प्रजापति जिसके जीवन में सृष्टि की अनेक धाराएँ एक साथ आकर मिलने वाली थीं।
कश्यप की पत्नियों में अदिति, दिति, दनु, विनता और कद्रू प्रमुख थीं। उनके गर्भों से सृष्टि ने अपने अनेक स्वभावों को जन्म दिया।
अदिति से आदित्य उत्पन्न हुए-प्रकाश, व्यवस्था और दैवी सत्ता से जुड़े हुए।
दिति से दैत्य उत्पन्न हुए-प्रचण्ड, स्वाभिमानी और अपनी शक्ति को किसी बाहरी व्यवस्था के सामने सहजता से न झुकाने वाले।
दनु से दानवों की परंपरा चली। विनता से गरुड़ और अरुण जैसे तेजस्वी नाम जुड़े और कद्रू से नागों की विस्तृत संतति पृथ्वी के गर्भ में अपनी रहस्यमयी शक्ति के साथ फैलती गई।
एक ही पिता की संततियाँ थीं, पर उनके स्वभाव भिन्न थे।
प्रकाश और अन्धकार।
आकाश और पृथ्वी।
अग्नि और जल।
गति और स्थिरता।
सृष्टि ने इन भिन्नताओं को विरोध के रूप में नहीं बनाया था। वे उसके विस्तार के लिए आवश्यक थीं। विविधता ही उसकी शक्ति थी।
किन्तु विविधता के साथ एक और चीज जन्म लेती है-पहचान।
पहचान के साथ तुलना आती है।
तुलना धीरे-धीरे श्रेष्ठता की इच्छा में बदलती है और श्रेष्ठता की इच्छा, जब अपने लिए सत्ता माँगने लगती है, तब भिन्नता संघर्ष का रूप लेने लगती है।
अभी वह समय नहीं आया था।
देव और दैत्य तब एक ही विराट् परिवार की अलग-अलग शाखाएँ थे। किसी ने यह प्रश्न नहीं उठाया था कि कौन श्रेष्ठ है। किसी ने अपने जन्म को दूसरे के जन्म से बड़ा सिद्ध करने की आवश्यकता अनुभव नहीं की थी।
लेकिन समय प्रश्नों को जन्म देता है।
और प्रश्न, यदि उत्तर न पाएँ, तो मनुष्य के भीतर दीवारें खड़ी करने लगते हैं।
कश्यप की संततियों में भी धीरे-धीरे यही होने लगा। अदिति के पुत्रों में तेज था, दिति के पुत्रों में प्रचण्ड बल; दनु की संतति में रहस्य था, विनता की संतानों में आकाश की आकांक्षा और कद्रू की संतति में धरती के गर्भ जैसी कुण्डलित शक्ति।
सृष्टि ने किसी को छोटा नहीं बनाया था।
छोटा-बड़ा मन ने बनाया।
नाम पहचान बने, पहचान पक्ष बनी और पक्ष धीरे-धीरे संघर्ष में बदलने लगा।
इसी वंश में आगे चलकर दो भाई जन्म लेने वाले थे-हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु।
एक अपनी शक्ति को बाहुबल में खोजेगा। दूसरा उसी शक्ति को सत्ता में बदलने का प्रयास करेगा। और उसी सत्ता के भीतर एक दिन ऐसा बालक जन्म लेगा, जो अपने पिता से पूछेगा-
क्या शक्ति ही सत्य है?
उस प्रश्न की प्रतिध्वनि बहुत दूर तक जाएगी। वह केवल एक पिता और पुत्र के बीच का प्रश्न नहीं होगा; वह सत्ता और सत्य, भय और विश्वास, अधिकार और स्वतंत्रता के बीच खिंची हुई रेखा को चुनौती देगा।
और इसी वंश में बहुत आगे चलकर एक और कथा जन्म लेगी-एक ऐसे राजा की, जिसके सामने यह प्रश्न खड़ा होगा कि क्या मनुष्य अपनी सत्ता से बड़ा हो सकता है।
लेकिन वह सब अभी भविष्य में था।
अभी सृष्टि अपनी पहली यात्रा पर थी।
हिरण्यगर्भ की स्वर्णिम सम्भावना से ब्रह्मा तक, ब्रह्मा से प्रजापतियों तक, मरीचि से कश्यप तक और कश्यप से उन असंख्य संततियों तक, जिनके भीतर आने वाले युगों का संघर्ष बीज की तरह छिपा था।
उस बीज को अभी अंकुरित होना था।
समय को अभी कई करवटें लेनी थीं।
देवताओं को अभी अपने प्रकाश पर गर्व करना था। दैत्यों को अपने बल पर विश्वास करना था। सत्ता को अभी अपने लिए तर्क गढ़ने थे और भक्ति को अभी उस सत्ता के सामने खड़ा होना था।
किन्तु इन सबके पहले एक स्त्री थी, जिसके भीतर इस संघर्ष की पहली गहरी हलचल उठने वाली थी।
वह थी-दिति।
उसकी कथा केवल एक माँ की कथा नहीं थी। वह उस प्रश्न की कथा थी, जो सृष्टि के आरम्भ से ही उसके भीतर कहीं छिपा था-
यदि भिन्नता सृष्टि का स्वभाव है, तो क्या भिन्न होने वाले को हीन समझना भी सृष्टि का नियम है?
समय इस प्रश्न का उत्तर देने वाला था।
और उस उत्तर की शुरुआत दिति से होने वाली थी।
यहीं से कथा आरम्भ होती है।
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कोल्हानम -उपन्यास ( kolhanam) डॉ मिथिलेश चौबे( Free Download)
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कोल्हानम्
उपन्यास के विषय में
झारखंड के पहाड़, पठार और आरण्यक प्रदेश विभिन्न जनजातीय समुदायों के सदियों पुराने निवास-स्थान रहे हैं। कोल्हानम् की कहानी इन्हीं धरतीपुत्रों के शौर्य, बलिदान तथा सनातन धर्म-संस्कृति के लिए मर-मिटने की गाथा है। यह उस इतिहास की कथा है, जो लिखित इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं पा सका, किंतु इन वनवासियों की लोककथाओं, लोककलाओं और लोकगीतों में अनादिकाल से सुरक्षित रहा है तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर प्रवाहित होता आया है।
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण सहित विभिन्न पुरातात्त्विक अध्ययनों के माध्यम से इस प्रदेश में अनेक प्रागैतिहासिक असुर-स्थलों, शैलचित्रों तथा प्राचीन मंदिरों आदि के साक्ष्य प्रकाश में आए हैं। कोल्हानम् में इन्हीं पुरातात्त्विक साक्ष्यों की पृष्ठभूमि में इस क्षेत्र के निवासियों की शौर्यगाथाओं को एक अत्यंत रोचक कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इस उपन्यास में वर्णित ऐतिहासिक घटनाओं और स्थानों के आधार विभिन्न रूपों में पुरातात्त्विक उत्खननों, प्राचीन बौद्ध ग्रंथों, इतिहास की मानक पुस्तकों तथा आधुनिक इतिहासकारों के अध्ययनों में मिलते हैं। उपन्यास में वर्णित मुंडेश्वरी मंदिर (कैमूर), टांगीनाथ धाम (गुमला), हंसा, सरिदकेल (खूंटी), तसना एवं करकरी, नदियाँ (खूंटी), सीताकुंड (हजारीबाग), सरजमहातू (चाईबासा) और हराडीह (राँची) आदि स्थान पुरातात्त्विक महत्त्व के लिए उल्लेखनीय हैं। इनमें से कुछ स्थल वर्तमान झारखंड राज्य में तथा कुछ उसके बाहर स्थित हैं।
उपन्यास को रोचक बनाने और ऐतिहासिक स्थलों एवं घटनाओं को कथात्मक रूप देने के उद्देश्य से लेखक ने कुछ काल्पनिक घटनाओं तथा पात्रों का भी सहारा लिया है। अतः इसमें इतिहास, लोकस्मृति, पुरातात्त्विक साक्ष्यों और कल्पना का समन्वय देखने को मिलता है।
इस उपन्यास में क्षेत्र की दो प्रमुख जनजातियों—असुरों और मुंडाओं—के मगध के मौर्य, शुंग एवं कण्व राजवंशों तथा दक्षिण के आंध्र-भृत्य सातवाहन राजवंश के साथ ईसा-पूर्व काल में रहे संबंधों का वर्णन किया गया है। कोल्हानम् में सम्राट अशोक, पुष्यमित्र शुंग और आंध्र-भृत्य गौतमीपुत्र शातकर्णि के चरित्रों का चित्रण रूढ़ धारणाओं तक सीमित न रहकर आधुनिक अनुसंधानों की दृष्टि से किया गया है। कथा में ‘तिस्स’ जैसे कुछ ऐसे पात्रों को भी स्थान दिया गया है, जिनका उल्लेख बौद्ध ऐतिहासिक परंपराओं में मिलता है, किंतु जिन्हें सामान्य इतिहास-लेखन में अपेक्षाकृत कम महत्त्व मिला है।
वैदिक, बौद्ध, जैन और आजीवक परंपराएँ भारतीय धार्मिक एवं दार्शनिक इतिहास की विविध धाराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। भारतीय सभ्यता की इस बहुलतापूर्ण विरासत और उसकी समकालीन चुनौतियों को रेखांकित करता हुआ यह उपन्यास भारतीय इतिहास एवं पौराणिक आख्यानों को वर्तमान संदर्भों में प्रस्तुत करता है।
अपने कथ्य के माध्यम से कोल्हानम् झारखंड के जंगलों और पठारी क्षेत्रों में जारी धर्मांतरण की प्रक्रियाओं तथा उनके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों पर प्रश्न उठाता है। साथ ही, शोध, शोधपत्र-लेखन और इतिहास-लेखन के नाम पर होने वाली बौद्धिक अनियमितताओं, पूर्वाग्रहों और संभावित वैचारिक षड्यंत्रों की परतें भी खोलने का प्रयास करता है।
डॉ. मिथिलेश चौबे
कोल्हानम -उपन्यास ( kolhanam) डॉ मिथिलेश चौबे( Free Download)
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सन अस्सी (San Assi) – डॉ मिथिलेश चौबे -सन अस्सी (San Assi) – डॉ मिथिलेश चौबे –(( Free Download))
भूमिका-यह पाठ आपके उपन्यास ‘सन अस्सी’ की एक प्रभावशाली साहित्यिक समीक्षा है। OCR की त्रुटियों को सुधारते हुए मूल समीक्षा की शैली, प्रशंसात्मक स्वर और आलोचनात्मक विशेषताओं को सुरक्षित रखा गया है।
सन अस्सी
लेखक: डॉ. मिथिलेश कुमार चौबे
ISBN: 978-93-5267-586-9
‘सन अस्सी’ जमशेदपुर के साहित्य-जगत के सफलतम एवं सर्वाधिक चर्चित उपन्यासों में से एक है। इसका प्रथम संस्करण 2017 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास की अब तक 5000 से अधिक प्रतियाँ विभिन्न बुक स्टॉलों तथा ऑनलाइन माध्यमों से बिक चुकी हैं।
1980 के दशक के भारत के एक छोटे औद्योगिक शहर—जमशेदपुर—में गंगा के मैदानी क्षेत्र की कृषक पृष्ठभूमि से आकर बसे किसान-पुत्रों का कारखाना-मजदूर के रूप में रूपांतरण तथा उनकी जीवनशैली में होने वाले बदलावों का यह उपन्यास सूक्ष्मता से वर्णन करता है। हिंदी साहित्य का अनावश्यक मकड़जाल बुनने के बजाय यह अत्यंत सहजता से सन अस्सी के दशक के जमशेदपुर की कहानी कहता है। ‘सन अस्सी’ केवल जमशेदपुर के एक मुहल्ले के लोगों की कहानी नहीं है, बल्कि समकालीन समाज के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय जीवन का जीवंत दस्तावेज भी है।
‘सन अस्सी’ के लेखक की सबसे बड़ी विशेषता संवाद को साहित्यिक आडंबर पर प्राथमिकता देने का साहस है। इस उपन्यास में लेखक अपनी आड़ी-तिरछी शब्दावली और अजीबोगरीब, किंतु बेहद दिलचस्प वाक्य-विन्यास के माध्यम से एक नितांत मौलिक, अनूठा और विलक्षण प्रयोग करता है।
‘सन अस्सी’ के शुरुआती पन्नों में एक अजीब-सा सुकूनभरा ठहराव है, लेकिन शीघ्र ही इसकी असामान्य गति और घटनाओं का चक्रव्यूह पाठक को अभिभूत कर देता है। फिर ‘सन अस्सी’ को आप ‘सच’ कहें या ‘फसाना’, यह पाठक को आखिरी पन्ने तक ठहरने नहीं देती।
आप जैसे-जैसे इस पुस्तक के पन्ने पलटते जाएँगे, वैसे-वैसे इसके पात्र आपके इर्द-गिर्द आकर खड़े हो जाएँगे और आपको अतीत की सैर पर अपने साथ ले जाएँगे। ऐसा लगेगा, मानो उनसे आपका बहुत पुराना परिचय हो।
‘सन अस्सी’ का पहला हिस्सा उस दौर के किशोरों की नियति का चित्रण करता है, जबकि दूसरा हिस्सा उनके युवावस्था के संघर्षों को सामने लाता है। घटनाएँ भले ही जानी-पहचानी हों, लेकिन लेखन की भाषा, शैली, प्रवाह और निरंतरता उन्हें एक अनूठे रूप में स्थापित करती है।सन अस्सी (San Assi) – डॉ मिथिलेश चौबे -सन अस्सी (San Assi) – डॉ मिथिलेश चौबे –(( Free Download))
पिंगाक्ष-उपन्यास -pingaksh- Dr. Mithilesh Choubey
उपन्यास के बारें में – भूमिका –पिंगाक्ष-यह उपन्यास झारखण्ड के गुमला जिले में अवस्थित आंजन ग्राम के आसपास युगों से निवास करने वाले आदिम आदिवासियों के परिवार में जन्मे एक ऐसे आदिवासी युवक की कहानी है, जो अपने आदिपूर्वज हनुमानजी की तलाश में तीर्थ स्थलों की ख़ाक छानता फिरता है. कालान्तर में उसके साथ तीन अन्य युवक भी जुड़ते है जो रामजन्म स्थल ‘अवध’ के अस्तित्व को प्रमाणित करने वाले प्राचीन पुरातात्विक साक्ष्यों की तलाश में हैं।
बारहवीं सदी से लेकर वर्तमान सदी की विशिष्ट ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे यह उपन्यास, झारखण्ड, बिहार और उत्तरप्रदेश के अति प्राचीन तीर्थ स्थलों की पृष्ठभूमि में रहस्य और रोमांच का एक अद्भुत तिलस्म रचता है।
@लेखक
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